भाग 1
मजदूर वर्ग को अपनी क्रांतिकारी लड़ाई में एक संगठन की ज़रूरत होती है। जब बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ मिलकर काम करना हो, तो उनके बीच समझ बनाने, बात करने, फैसले लेने और उन्हें लागू करने के लिए कोई न कोई तरीका चाहिए होता है।
इसका मतलब यह नहीं कि हर बड़ी हड़ताल या आंदोलन किसी केंद्रीय समिति के आदेश से, सेना जैसे अनुशासन में होता है। ऐसा कभी-कभी होता भी है, लेकिन अक्सर मजदूर अपने जोश, एकजुटता और जज़्बे के कारण खुद ही हड़ताल पर उतर आते हैं कभी किसी साथी की मदद के लिए, या किसी पूंजीवादी अन्याय के विरोध में बिना किसी पहले से बनी योजना के। ऐसी हड़ताल जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल जाती है।
पहली रूसी क्रांति के दौरान हड़तालों की लहरें उठती और गिरती रहीं। अक्सर वे हड़तालें सबसे सफल रहीं जो पहले से तय नहीं थीं, जबकि केंद्रीय समितियों द्वारा घोषित हड़तालें अक्सर नाकाम रहीं।
हड़ताल करने वाले मजदूर आपस में जुड़े रहना चाहते हैं ताकि वे एक संगठित शक्ति बन सकें। यहाँ एक मुश्किल आती है। बिना मजबूत संगठन के, बिना अपनी ताकत और इच्छा को एक साथ जोड़े, वे पूंजीवादी सत्ता के मजबूत ढांचे के सामने नहीं टिक सकते। लेकिन जब लाखों मजदूर एक साथ जुड़ते हैं, तो यह काम कुछ प्रतिनिधियों के ज़रिए ही हो पाता है। और हमने देखा है कि ऐसे प्रतिनिधि अक्सर खुद संगठन के मालिक बन जाते हैं, और उनके हित मजदूरों के क्रांतिकारी हितों से अलग हो जाते हैं।
तो सवाल यह है: मजदूर वर्ग बिना अफसरशाही के जाल में फंसे, अपनी ताकत को एक बड़े संगठन में कैसे जोड़े? इसका जवाब एक और सवाल में छिपा है अगर मजदूर सिर्फ अपना चंदा देते हैं और नेताओं के कहने पर हड़ताल पर जाते या वापस आते हैं, तो क्या वे सच में अपनी आज़ादी की लड़ाई खुद लड़ रहे हैं?
आज़ादी की लड़ाई का मतलब यह नहीं कि आप अपने नेताओं को अपनी जगह सोचने दें और चुपचाप उनके पीछे चलें, या कभी-कभार उनकी आलोचना कर दें। आज़ादी की लड़ाई का मतलब यह है कि अपनी पूरी क्षमता से हिस्सा लेना, खुद सोचना, खुद फैसला लेना, और बराबरी के साथियों के बीच एक जिम्मेदार इंसान की तरह जीना। यह सच है कि थके हुए दिमाग से खुद सोचना और सही-गलत तय करना सबसे मुश्किल काम है , चंदा देने और आज्ञा मानने से कहीं ज़्यादा कठिन। लेकिन आज़ादी का यही एकमात्र रास्ता है। अगर आप दूसरों के ज़रिए “आज़ाद” कराए जाते हैं, जहाँ उनका नेतृत्व ही आज़ादी का मुख्य आधार है, तो इसका मतलब है पुराने मालिकों की जगह नए मालिक मिल गए।
आज़ादी, यानी मजदूरों का लक्ष्य, इसका मतलब है कि हर इंसान खुद दुनिया चला सके, धरती के खज़ानों का इस्तेमाल कर सके, ताकि यह सबके लिए एक खुशहाल घर बन जाए। लेकिन यह तभी मुमकिन है जब वे खुद इसे हासिल करें और इसकी रक्षा करें।
मजदूरों की क्रांति सिर्फ पूंजीवादी सत्ता को हराने भर की बात नहीं है। यह पूरे मेहनतकश समाज का अज्ञान और परावलंबन से निकलकर आत्मनिर्भरता और स्पष्ट समझ की ओर बढ़ना है।
असली संगठन जैसा मजदूरों को क्रांति में चाहिए वो है जिसमें हर कोई तन-मन से शामिल हो , जहाँ हर व्यक्ति नेतृत्व में भी और काम में भी हिस्सा ले और खुद सोचे, खुद फैसला करे और अपनी पूरी क्षमता से काम करे। ऐसा संगठन आत्मनिर्णय करने वाले लोगों का समूह होता है। इसमें पेशेवर नेताओं की कोई जगह नहीं। हाँ, आज्ञापालन होता है लेकिन हर कोई उन्हीं फैसलों का पालन करता है जो उसने खुद बनाने में हिस्सा लिया हो। पूरी सत्ता हमेशा मजदूरों के ही हाथ में रहती है।
क्या ऐसा संगठन बनाया जा सकता है? इसका ढांचा कैसा हो?
इसे गढ़ने या सोच-विचार कर बनाने की ज़रूरत नहीं इतिहास ने इसे पहले ही जन्म दे दिया है। यह वर्ग-संघर्ष के व्यावहारिक अनुभव से खुद-ब-खुद उपजा है। इसका शुरुआती रूप हड़ताल समितियों में मिलता है। किसी बड़ी हड़ताल में सारे मजदूर एक जगह इकट्ठा नहीं हो सकते, इसलिए वे प्रतिनिधि चुनते हैं जो एक समिति बनाते हैं। यह समिति सिर्फ मजदूरों की इच्छा को लागू करने वाली संस्था होती है यह हमेशा मजदूरों के संपर्क में रहती है और उनके फैसलों को अमल में लाती है। हर प्रतिनिधि को किसी भी समय बदला जा सकता है, इसलिए ऐसी समिति कभी अपने आप में एक अलग सत्ता नहीं बन पाती। इस तरह एकजुट कार्रवाई भी होती है, और फैसले भी मजदूरों के अपने हाथ में रहते हैं। लेकिन आमतौर पर हड़तालों में, ट्रेड यूनियन और उनके नेता इन समितियों से नेतृत्व छीन लेते हैं।
रूसी क्रांति के दौरान जब फैक्ट्रियों में अनियमित रूप से हड़तालें शुरू हुईं, तो मजदूरों ने ऐसे प्रतिनिधि चुने जो पूरे शहर, उद्योग या प्रांत के स्तर पर इकट्ठा होकर लड़ाई में एकजुटता लाते थे। चूंकि यह हड़तालें ज़ार-शाही के खिलाफ थीं, इसलिए इन्हें राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करनी पड़ी और राजनीतिक भूमिका निभानी पड़ी। इन्हें “सोवियत” यानी परिषद ( council) कहा गया। इन सोवियतों में हर मुद्दे, हर मजदूर हित और हर राजनीतिक घटना पर चर्चा होती थी। प्रतिनिधि लगातार सभा और अपनी फैक्ट्री के बीच आते-जाते रहते थे। फैक्ट्रियों में मजदूर खुद आम सभाओं में यही मुद्दे चर्चा करते, फैसले लेते और अक्सर नए प्रतिनिधि भेजते। जानकार समाजवादियों को सचिव नियुक्त किया जाता था ताकि वे अपने व्यापक ज्ञान से सलाह दे सकें। जब ज़ार-शाही सत्ता ठप पड़ गई और अफसरों-अधिकारियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो इन सोवियतों को एक तरह की आरंभिक सरकार जैसा काम करना पड़ा।
इस तरह ये सोवियत क्रांति के स्थायी केंद्र बन गए जो हड़ताल कर रहे और काम कर रहे, दोनों तरह की फैक्ट्रियों के प्रतिनिधियों से बने थे। इनके सदस्य अक्सर बदलते रहते, कभी-कभी पूरी सोवियत को गिरफ्तार कर लिया जाता और नए प्रतिनिधि आ जाते। साथ ही, इन्हें यह भी पता था कि उनकी सारी ताकत मजदूरों की हड़ताल करने या न करने की इच्छा में ही निहित है ,इसलिए जब उनके आह्वान मजदूरों की भावनाओं (ताकत, कमजोरी, जोश या सावधानी) से मेल नहीं खाते, तो उनकी बात नहीं मानी जाती थी। इस तरह सोवियत व्यवस्था क्रांतिकारी मजदूर वर्ग के लिए सही संगठन साबित हुई। 1917 में रूस ने इसे तुरंत अपनाया, और हर जगह मजदूरों और सैनिकों की सोवियतें बनीं जो क्रांति की मुख्य शक्ति बनीं।
इसका उल्टा उदाहरण जर्मनी में मिला। 1918 में सैन्य सत्ता के पतन के बाद, रूस की नकल में मजदूर-सैनिक परिषदें बनीं। लेकिन जर्मन मजदूर, जो पार्टी और यूनियन के अनुशासन में पले-बढ़े थे और गणतंत्र व सुधार जैसे सामाजिक-लोकतांत्रिक विचारों से प्रभावित थे, उन्होंने अपनी पार्टी और यूनियन के अधिकारियों को ही इन परिषदों में प्रतिनिधि चुन लिया। जब वे खुद लड़ते और काम करते, तब सही करते, लेकिन आत्मविश्वास की कमी के कारण उन्होंने पूंजीवादी विचारों से भरे नेता चुन लिए, और इन्होंने हमेशा मामला बिगाड़ दिया। यही कारण है कि एक “परिषद कांग्रेस” ने खुद ही एक नई संसद के लिए रास्ता छोड़ने का फैसला कर लिया।
इससे यह साफ हुआ कि परिषद-व्यवस्था सिर्फ एक क्रांतिकारी मजदूर वर्ग के लिए ही उपयुक्त संगठन है। अगर मजदूर क्रांति को आगे नहीं बढ़ाना चाहते, तो उन्हें सोवियत की ज़रूरत नहीं। अगर मजदूर अभी क्रांति की राह देखने लायक तैयार नहीं हैं, और नेताओं के भाषण देने, समझौता करने और पूंजीवाद के भीतर सुधार की मोलभाव से संतुष्ट हैं, तो उनके लिए संसद और पार्टी-यूनियन कांग्रेस ही काफी हैं जिन्हें “मजदूर संसद” भी कहा जा सकता है क्योंकि वे उसी सिद्धांत पर काम करती हैं। लेकिन अगर वे पूरे जोश से क्रांति के लिए लड़ते हैं, हर घटना में तीव्रता से हिस्सा लेते हैं, हर बात खुद सोचते और तय करते हैं क्योंकि लड़ाई खुद उन्हें लड़नी है तो मजदूर परिषदें ही वह संगठन हैं जो उन्हें चाहिए।
इसका मतलब यह भी है कि मजदूर परिषदें किसी क्रांतिकारी गुट द्वारा नहीं बनाई जा सकतीं। ऐसे गुट सिर्फ अपने साथी मजदूरों को परिषद-संगठन की ज़रूरत समझा सकते हैं, जब मजदूर वर्ग एक आत्मनिर्णायक शक्ति के रूप में आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा हो। परिषदें सिर्फ लड़ते हुए जनसमूह के लिए संगठन हैं, पूरे मजदूर वर्ग के लिए किसी क्रांतिकारी गुट के लिए नहीं।
ये परिषदें किसी भी क्रांतिकारी हरकत की पहली शुरुआत के साथ ही जन्म लेती और बढ़ती हैं। क्रांति के बढ़ने के साथ-साथ इनका महत्व और इनके काम भी बढ़ते जाते हैं। शुरुआत में ये साधारण हड़ताल समितियों जैसी दिखती हैं, जो मजदूर नेताओं के खिलाफ खड़ी होती हैं जब हड़ताल उनकी मंशा से आगे निकल जाती है, और यूनियन व उनके नेताओं के खिलाफ बगावत करती हैं।
एक आम हड़ताल में इन समितियों के काम और बढ़ जाते हैं। अब हर फैक्ट्री और प्लांट के प्रतिनिधियों को लड़ाई की सारी परिस्थितियों पर चर्चा करनी और फैसला लेना होता है ,वे मजदूरों की पूरी ताकत को सोच-समझकर की गई कार्रवाई में बदलने की कोशिश करते हैं ,उन्हें यह भी देखना होता है कि सरकार के कदमों, सैनिकों या पूंजीवादी गिरोहों के काम पर कैसे प्रतिक्रिया दें। इस हड़ताल-कार्रवाई के ज़रिए ही असली फैसले मजदूर खुद लेते हैं। परिषदों में मजदूरों की राय, इच्छा, तैयारी, झिझक या उत्साह, ऊर्जा और मुश्किलें सब मिलकर एक साझा दिशा बनाती हैं। ये परिषदें मजदूरों की ताकत का प्रतीक होती हैं, लेकिन साथ ही ये सिर्फ प्रवक्ता होती हैं, जिन्हें किसी भी वक्त बदला जा सकता है। कभी ये पूंजीवादी दुनिया के लिए “गैर-कानूनी” मानी जाती हैं, तो अगले ही पल सरकार के बड़े अधिकारियों से बराबरी के स्तर पर बात करती हैं।
जब क्रांति इतनी ताकतवर हो जाती है कि राज्य-सत्ता खुद खतरे में पड़ जाए, तब मजदूर परिषदों को राजनीतिक काम भी संभालने पड़ते हैं। एक राजनीतिक क्रांति में यही इनका पहला और मुख्य काम होता है। ये मजदूर-सत्ता के केंद्रीय निकाय बन जाती हैं , इन्हें विरोधी को कमज़ोर करने और हराने के हर उपाय करने होते हैं। युद्ध के समय की सत्ता की तरह, इन्हें पूरे देश की निगरानी करनी होती है, पूंजीवादी वर्ग की ताकत फिर से जुटाने की कोशिशों को रोकना होता है। इन्हें कई सार्वजनिक मामलों की देखभाल भी करनी होती है जो पहले राज्य के काम हुआ करते थे जैसे जन-स्वास्थ्य, सार्वजनिक सुरक्षा, और सामाजिक जीवन का सुचारू चलना। और सबसे ज़रूरी व मुश्किल काम उत्पादन (production) की खुद देखभाल करना।
इतिहास में कोई भी सामाजिक क्रांति सिर्फ सत्ताधारियों को बदलने से शुरू नहीं हुई, जिसके बाद सत्ता हासिल करके नए कानूनों से समाज बदला गया हो। लड़ाई से पहले और उसके दौरान ही, उभरता हुआ वर्ग पुराने ढांचे के भीतर अपने नए सामाजिक अंग विकसित कर लेता है, जैसे मरे हुए पेड़ के भीतर से नई शाखाएं फूटती हैं।
फ्रांसीसी क्रांति में, नया पूंजीवादी वर्ग व्यापारी, कारीगर हर शहर और गाँव में अपने सामुदायिक बोर्ड और अदालतें बना रहे थे, भले ही वे उस समय गैरकानूनी थीं, और इस तरह राजशाही के कमज़ोर पड़ चुके अधिकारियों के कामों को खुद संभाल रहे थे। जब उनके प्रतिनिधि पेरिस में नया संविधान बना रहे थे, असली संविधान पूरे देश में नागरिकों की राजनीतिक सभाओं से बन रहा था, जिसे बाद में कानूनी मान्यता मिली।
उसी तरह, मजदूरों की क्रांति में भी नया उभरता वर्ग अपने नए संगठन बनाता है, जो धीरे-धीरे पुरानी राज्य-व्यवस्था की जगह ले लेते हैं। मजदूर परिषदें, राजनीतिक संगठन के नए रूप के तौर पर, संसदीय व्यवस्था जो पूंजीवादी शासन का राजनीतिक रूप है की जगह ले लेती हैं।
भाग 2
पूंजीवादी विचारकों और सामाजिक जनवादी दोनों की नज़र में संसदीय लोकतंत्र ही सबसे परिपूर्ण, न्यायपूर्ण और समानता वाला लोकतंत्र माना जाता है। लेकिन असल में यह सिर्फ पूंजीवादी वर्चस्व का एक नकाब है, और यह न्याय व समानता के खिलाफ है। असली मजदूर-लोकतंत्र तो परिषद-व्यवस्था ही है।
संसदीय लोकतंत्र एक झूठा लोकतंत्र है। जनता को हर चार-पांच साल में एक बार वोट देने और अपने प्रतिनिधि चुनने का मौका मिलता है और अगर गलत आदमी चुन लिया, तो भुगतना उन्हें ही पड़ता है। जनता की ताकत सिर्फ वोटिंग के दिन दिखती है, उसके बाद वे बेबस हो जाते हैं। चुने हुए प्रतिनिधि अब जनता के शासक बन जाते हैं; वे कानून बनाते हैं, सरकारें बनाते हैं, और जनता को बस मानना पड़ता है। आमतौर पर, चुनावी तंत्र में सिर्फ बड़ी पूंजीवादी पार्टियां ही जीत पाती हैं, क्योंकि उनके पास बड़ा तंत्र, अखबार और प्रचार होता है। असंतुष्ट छोटे समूहों के असली प्रतिनिधियों को शायद ही कुछ सीटें मिलती हैं।
सोवियत व्यवस्था में हर प्रतिनिधि को किसी भी वक्त वापस बुलाया जा सकता है। मजदूर सिर्फ अपने प्रतिनिधि के संपर्क में ही नहीं रहते, बल्कि खुद हर बात पर चर्चा और फैसला करते हैं प्रतिनिधि तो बस परिषद तक संदेश पहुंचाने वाला अस्थायी दूत होता है। पूंजीवादी राजनेता इस बात की आलोचना करते हैं कि प्रतिनिधि को कभी-कभी अपनी निजी राय के खिलाफ भी बोलना पड़ता है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि चूंकि प्रतिनिधि स्थायी नहीं होता, इसलिए सिर्फ वही भेजा जाएगा जिसकी राय मजदूरों की राय से मेल खाती हो।
संसदीय प्रतिनिधित्व का सिद्धांत यह है कि प्रतिनिधि संसद में अपनी ज़मीर और सोच के हिसाब से काम करे और वोट दे। अगर वह किसी मुद्दे पर अपने मतदाताओं की राय पूछता भी है, तो यह सिर्फ उसकी अपनी समझदारी है। फैसला जनता नहीं, बल्कि वह खुद अपनी ज़िम्मेदारी पर लेता है। सोवियत व्यवस्था का सिद्धांत बिल्कुल उल्टा है , प्रतिनिधि सिर्फ मजदूरों की राय ही व्यक्त करता है।
संसद के चुनावों में नागरिकों को उनके रहने की जगह (इलाके, ज़िले) के हिसाब से बांटा जाता है। अलग-अलग पेशों और वर्गों के लोग, जिनमें आपस में कुछ खास साझा नहीं होता, सिर्फ पास-पास रहने की वजह से एक कृत्रिम समूह में जोड़ दिए जाते हैं, जिसका एक ही प्रतिनिधि चुना जाता है।
परिषदों में मजदूरों का प्रतिनिधित्व उनके स्वाभाविक समूहों यानी फैक्ट्री, दुकान या प्लांट के हिसाब से होता है। एक फैक्ट्री या बड़े प्लांट के मजदूर उत्पादन की एक इकाई होते हैं वे साझा काम से जुड़े होते हैं। क्रांतिकारी दौर में वे लगातार आपस में विचार साझा करते हैं, एक जैसी परिस्थितियों में रहते हैं और एक जैसे हित रखते हैं। उन्हें साथ मिलकर काम करना होता है फैक्ट्री एक इकाई के तौर पर हड़ताल करती है या काम करती है, और उसके मजदूर खुद तय करते हैं कि क्या करना है। इसलिए फैक्ट्रियों और कार्यस्थलों के हिसाब से संगठन और प्रतिनिधित्व ही सबसे उपयुक्त तरीका है।
यह क्रांति में उभर रही साम्यवादी व्यवस्था के प्रतिनिधित्व का सिद्धांत भी है। उत्पादन ही समाज की बुनियाद है बल्कि यूं कहें कि यही समाज का असली सार है। इसलिए उत्पादन की व्यवस्था ही समाज की व्यवस्था होती है। फैक्ट्रियां समाज नाम के शरीर की कोशिकाएं (cells) हैं। राजनीतिक संस्थाओं का मुख्य काम जो असल में पूरे समाज के प्रबंधन का ही दूसरा नाम है समाज के उत्पादक कार्य से जुड़ा होता है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि मेहनतकश लोग अपनी परिषदों में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करें और अपने प्रतिनिधि अपनी उत्पादन-इकाइयों से ही चुनें।
लेकिन यह मत सोचिए कि संसदीय व्यवस्था, जो पूंजीवाद का राजनीतिक रूप है, उत्पादन पर आधारित नहीं थी। राजनीतिक संगठन हमेशा उत्पादन के स्वरूप के अनुसार ही ढलता है। रहने की जगह के हिसाब से प्रतिनिधित्व, छोटे पूंजीवादी उत्पादन के दौर की देन है, जहाँ हर आदमी अपने छोटे व्यापार का मालिक माना जाता था। तब एक ही जगह के व्यापारी आपस में जुड़े होते, एक-दूसरे को जानते और पड़ोसी होते थे, इसलिए संसद में एक साझा प्रतिनिधि भेजते। यही संसदीय व्यवस्था की बुनियाद थी। बाद में यही व्यवस्था पूंजीवाद के भीतर बढ़ते और बदलते वर्ग-हितों के प्रतिनिधित्व के लिए सही साबित हुई।
अब यह भी साफ हो जाता है कि संसद के प्रतिनिधियों को राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में क्यों लेनी पड़ी। उनका राजनीतिक काम समाज के कुल काम का बस एक छोटा हिस्सा था। सबसे ज़रूरी काम उत्पादन हर अलग व्यापारी-नागरिक का निजी काम था, जिसमें उनकी लगभग पूरी ऊर्जा और ध्यान लगता था। जब हर व्यक्ति अपने छोटे हिस्से का ध्यान रखता, तो पूरा समाज अपने आप ठीक चलता रहता। कानून द्वारा सामान्य नियम बनाना ज़रूरी तो था, पर छोटा काम था, जिसे राजनेताओं नाम के एक खास समूह पर छोड़ा जा सकता था। साम्यवादी उत्पादन में इसका उल्टा होता है। यहाँ सबसे ज़रूरी चीज़ सामूहिक उत्पादन कार्य पूरे समाज का साझा काम है, जो सभी मजदूरों से जुड़ा है। उनका निजी काम उनकी पूरी ऊर्जा नहीं लेता; उनका ध्यान समाज के साझा काम की ओर होता है। इसलिए इस सामूहिक काम के नियमन को किसी खास समूह पर नहीं छोड़ा जा सकता यह पूरे मेहनतकश समाज का सीधा हित है।
संसदीय व्यवस्था और सोवियत व्यवस्था में एक और फर्क है। संसदीय लोकतंत्र में, हर वयस्क पुरुष (और कभी-कभी महिला) को सिर्फ इंसान होने के “जन्मसिद्ध अधिकार” के आधार पर एक वोट दिया जाता है जैसा भाषणों में बड़े शानदार ढंग से कहा जाता है। दूसरी ओर, सोवियतों में सिर्फ मजदूरों को ही प्रतिनिधित्व मिलता है। तो क्या परिषद-व्यवस्था को सच में लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, अगर वह बाकी वर्गों को बाहर रखती हो?
परिषद-व्यवस्था असल में सर्वहारा वर्ग (मजदूर वर्ग) की तानाशाही का रूप है। मार्क्स और एंगेल्स ने आधी सदी से भी पहले बताया था कि सामाजिक क्रांति मजदूर वर्ग की तानाशाही की ओर ले जाएगी, और समाज को बदलने के लिए यह ज़रूरी अगला राजनीतिक रूप होगा। जो समाजवादी सिर्फ संसदीय प्रतिनिधित्व के बारे में सोचते थे, वे इस “अन्याय” की सफाई देते या आलोचना करते थे कि कुछ लोगों को उनके वर्ग के आधार पर वोट से बाहर रखना गलत है। लेकिन अब हम देखते हैं कि मजदूर वर्ग के संघर्ष का स्वाभाविक विकास खुद ही इस तानाशाही के अंग सोवियत पैदा करता है।
यह अन्याय नहीं है कि क्रांतिकारी मजदूर वर्ग की लड़ाई के केंद्र, यानी परिषदें, विरोधी वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल न करें। और आगे भी यही बात लागू होती है। उभरते साम्यवादी समाज में पूंजीपतियों के लिए कोई जगह नहीं उन्हें खत्म होना है, और वे खत्म हो जाएंगे। जो भी सामूहिक काम में हिस्सा लेता है, वह समुदाय का सदस्य है और फैसलों में हिस्सा लेता है। लेकिन जो लोग सामूहिक उत्पादन प्रक्रिया से बाहर हैं, वे परिषद-व्यवस्था के ढांचे के कारण खुद-ब-खुद इससे बाहर हो जाते हैं। पुराने शोषकों और लुटेरों के पास ऐसे उत्पादन पर कोई वोट नहीं, जिसमें वे हिस्सा ही नहीं लेते।
समाज में कुछ और वर्ग भी हैं जो दोनों मुख्य विरोधी वर्गों में सीधे नहीं आते जैसे छोटे किसान, स्वतंत्र कारीगर, बुद्धिजीवी। क्रांतिकारी लड़ाई में वे कभी इधर, कभी उधर झुक सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनकी लड़ने की ताकत ज़्यादा नहीं होती और उनके संगठन व लक्ष्य अलग होते हैं। उनसे दोस्ती करना, या उन्हें तटस्थ रखना (अगर मुख्य लक्ष्य में बाधा न आए), या ज़रूरत पड़ने पर दृढ़ता से उनका सामना करना यह तय करना क्रांतिकारी मजदूर वर्ग की चतुराई और नीति का विषय होगा। उत्पादन-व्यवस्था में, अगर उनका काम उपयोगी और ज़रूरी है, तो उन्हें भी जगह मिलेगी और वे इस सिद्धांत के तहत अपना प्रभाव डाल सकेंगे कि जो काम करता है, उसी की उस काम को नियंत्रित करने में मुख्य आवाज़ होती है।
आधी सदी से भी पहले एंगेल्स ने कहा था कि मजदूरों की क्रांति के ज़रिए राज्य खत्म हो जाएगा; इंसानों पर शासन करने की जगह मामलों का प्रबंधन (managing of affairs) आ जाएगा। यह उस समय कहा गया था जब यह स्पष्ट नहीं था कि मजदूर वर्ग सत्ता में कैसे आएगा। अब हम देखते हैं कि यह बात सच साबित हो रही है। क्रांति की प्रक्रिया में पुरानी राज्य-सत्ता खत्म हो जाएगी, और उसकी जगह लेने वाली संस्थाएं मजदूर परिषदें फिलहाल पूंजीवाद के बचे-खुचे अंशों को दबाने के लिए ज़रूरी राजनीतिक काम करती रहेंगी। लेकिन धीरे-धीरे उनका यह “शासन करने” वाला राजनीतिक काम सिर्फ समाज की ज़रूरतों के लिए सामान बनाने की सामूहिक उत्पादन-प्रक्रिया के प्रबंधन तक सिमट जाएगा।
— जे.एच. (J.H., यानी जॉन हार्पर, पानेकोएक का उपनाम)